Sunday, 25 September 2016

भारत-पाक के बीच सिंधु जल समझौते की कहानी


सिंधु जल संधि को दो देशों के बीच जल विवाद पर एक सफल अंतरराष्ट्रीय उदाहरण बताया जाता है.
56 साल पहले भारत और पाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
दोनो देशों के बीच दो युद्धों और एक सीमित युद्ध कारगिल और हज़ारों दिक्क़तों के बावजूद ये संधि कायम है. विरोध के स्वर उठते रहे लेकिन संधि पर असर नहीं पड़ा.
उड़ी चरमपंथी हमले में 18 भारतीय सैनिकों के मारे जाने के बाद एक बार फिर कयास लग रहे हैं कि क्या भारत, सिंधु जल समझौता रद्द कर सकता है?
गुरुवार को जब विदेश मंत्रालय प्रवक्ता विकास स्वरूप से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं देते हुए कहा, "आखिरकार किसी भी समझौते के लिए दोनो पक्षों में सद्भाव और सहयोग की ज़रूरत होती है."
सिंधु बेसिन ट्रीटी पर 1993 से 2011 तक पाकिस्तान के कमिश्नर रहे जमात अली शाह कहते हैं, "इस समझौते के नियमों के मुताबिक कोई भी एकतरफ़ा तौर पर इस संधि को रद्द नहीं कर सकता है या बदल सकता है. दोनो देश मिलकर इस संधि में बदलाव कर सकते हैं या एक नया समझौता बना सकते हैं."
उधर पानी पर वैश्विक झगड़ों पर किताब लिख चुके ब्रह्म चेल्लानी समाचार पत्र 'हिंदू' में लिखते हैं, "भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ की धारा 62 के अंतर्गत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों का इस्तेमाल उसके खिलाफ़ कर रहा है. अंततराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है."

क्या है सिंधु जल समझौता?


सिंधु नदी का इलाका करीब 11.2 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. ये इलाका पाकिस्तान (47 प्रतिशत), भारत (39 प्रतिशत), चीन (8 प्रतिशत) और अफ़गानिस्तान (6 प्रतिशत) में है.
एक आंकड़े के मुताबिक करीब 30 करोड़ लोग सिंधु नदी के आसपास के इलाकों में रहते हैं.
सिंधु जल संधि के पीछे की कहानी.
अमरीका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर इस समझौते की पीछे की कहानी है. ऐरॉन वोल्फ़ औऱ जोशुआ न्यूटन अपनी केस स्टडी में बताते हैं कि ये झगड़ा 1947 भारत के बंटवारे के पहले से ही शुरू हो गया था, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच.
1947 में भारत और पाकिस्तान के इंजीनियर मिले और उन्होंने पाकिस्तान की तरफ़ आने वाली दो प्रमुख नहरों पर एक 'स्टैंडस्टिल समझौते' पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार पाकिस्तान को लगातार पानी मिलता रहा. ये समझौता 31 मार्च 1948 तक लागू था.
जमात अली शाह के अनुसार 1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ ज़मीन पर हालात खराब हो गए.
भारत के इस कदम के कई कारण बताए गए जिसमें एक था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था. बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राज़ी हो गया.
स्टडी के मुताबिक 1951 में प्रधानमंत्री नेहरू ने टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत बुलाया. लिलियंथल पाकिस्तान भी गए और वापस अमरीका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी के बंटवारे पर एक लेख लिखा. ये लेख विश्व बैंक प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा और ब्लैक ने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया. और फिर शुरू हुआ दोनो पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला.
ये बैठकें करीब एक दशक तक चलीं और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी समझौते पर हस्ताक्षर हुए.

सिंधु जल समझौते की प्रमुख बातें.



1. समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया. सतलज, ब्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी बताया गया जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया.
2. समझौते के मुताबिक पूर्वी नदियों का पानी, कुछ अपवादों को छोड़े दें, तो भारत बिना रोकटोक के इस्तेमाल कर सकता है. पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा लेकिन समझौते के भीतर कुछ इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया गया, जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी. अनुबंध में बैठक, साइट इंस्पेक्शन आदि का प्रावधान है.
3. समझौते के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई. इसमें दोनो देशों के कमिश्नरों के मिलने का प्रस्ताव था. ये कमिश्नर हर कुछ वक्त में एक दूसरे से मिलेंगे और किसी भी परेशानी पर बात करेंगे.
4. अगर कोई देश किसी प्रोजेक्ट पर काम करता है और दूसरे देश को उसकी डिज़ाइन पर आपत्ति है तो दूसरा देश उसका जवाब देगा, दोनो पक्षों की बैठकें होंगी. अगर आयोग समस्या का हल नहीं ढूंढ़ पाती हैं तो सरकारें उसे सुलझाने की कोशिश करेंगी.
5. इसके अलावा समझौते में विवादों का हल ढूंढने के लिए तटस्थ विशेषज्ञ की मदद लेने या कोर्ट ऑफ़ आर्ब्रिट्रेशन में जाने का भी रास्ता सुझाया गया है.
संधि पर राजनीति.
भारत में एक वर्ग का मानना रहा है कि इस समझौते से भारत को आर्थिक नुकसान हो रहा है. जम्मू कश्मीर सरकार के मुताबिक इस संधि के कारण राज्य को हर साल करोड़ो का आर्थिक नुकसान हो रहा है. संधि पर पुनर्विचार के लिए विधानसभा में 2003 में एक प्रस्ताव भी पारित किया था. दिल्ली में एक सोच ये भी है पाकिस्तान इस संधि के प्रस्तावों का इस्तेमाल कश्मीर में गुस्सा भड़काने के लिए कर रहा है.

Saturday, 24 September 2016

पाकिस्तान गृहयुद्ध की ओर


हाल में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे पाक विरोधी आंदोलन और वहां की सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के कुछ वीडियो सामने आए। पाकिस्तानी सेना 1947 से ही इस क्षेत्र को एक छावनी की तरह इस्तेमाल कर रही है। 1980 के दशक से तो यह इलाका जिहादी गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है जो मुख्यत: पंजाबी और कबीलाई क्षेत्र के आतंकी नेताओं द्वारा आइएसआइ के निर्देशन में संचालित की जाती हैं। इस क्षेत्र में न तो कभी ऐसे कोई चुनाव हुए जिन्हें अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने स्वतंत्र माना हो और न ही इस क्षेत्र की जनता की बेहतरी के लिए पाकिस्तान ने कोई गंभीर प्रयास किए। गत वर्षो में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में चीनी सामरिक गतिविधियों को अनुमति दी और हाल में चीन-पाक आर्थिक कॉरिडोर का ऐलान हुआ जो चीन को बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ेगा। यह भारत और अमेरिका की पाकिस्तान एवं चीन की नौसैनिक नाकेबंदी करने की क्षमता को प्रभावित करेगा।

गुलाम कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में असंतोष भरे आंदोलन अस्सी के दशक से ही होते रहे हैं, लेकिन एक वीडियो सामने आने में तीन दशक लग गए। बलूचिस्तान में प्राकृतिक गैस एवं खनिजों के बड़े भंडार हैं। इस संपदा को पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी और पंजाबी राजनेता मिलकर लूट रहे हैं, जबकि बलूच जनता मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है। करीब 19000 बलूच लापता हैं। बलूच नेताओं के अनुसार पाक सुरक्षा बलों ने इन लोगों की हत्या कर दी है। बलूचिस्तान में गुमनाम सामूहिक कब्रों के मिलने का सिलसिला आम हो चुका है। इसी जुलाई में ईद के दिन पाक फौज ने अरवान जिले में तीन गांवों पर बमबारी कर महिलाओं और बच्चों सहित 200 से अधिक बलूचों को मार डाला। सिंध में तो 1972 से ही बांग्लादेश की तरह स्वतंत्र सिंधुदेश की मांग उठ रही है। 2012 से इस आंदोलन ने और जोर पकड़ा है।

मार्च 2012 में कराची में लाखों लोगों ने मुस्लिम लीग द्वारा 1940 के लाहौर अधिवेशन में पारित पाकिस्तान प्रस्ताव की 65वीं वर्षगांठ पर पाकिस्तान के विचार को नकारते हुए स्वतंत्र सिंधुदेश की मांग के समर्थन में जुलूस निकाला था। इसके कुछ ही दिन बाद सिंधुदेश आंदोलन के प्रमुख नेता बशीर अहमद कुरैशी की जहर देकर हत्या कर दी गई। सिंधी राष्ट्रवादी पाकिस्तान के सत्ता संस्थानों में पंजाबी वर्चस्व का विरोध करते रहे हैं और आइएसआइ समर्थित आतंकी संगठनों एवं मदरसों की सिंध में बढ़ती गतिविधियों को इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। पिछले महीने जब प्रधानमंत्री नवाज शरीफ संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित कर रहे थे तो बाहर बड़ी संख्या में मुहाजिर आजादी-आजादी के नारे लगा रहे थे। उनके अनुसार पाकिस्तान में 1947 से अब तक 13 लाख मुहाजिर मुसलमान हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं। मुहाजिरों के सबसे बड़े नेता अल्ताफ हुसैन ने मुहाजिरों की ओर से भावनात्मक अपील जारी करते हुए कहा था कि अगर भारत एक स्वाभिमानी देश है तो वह मुहाजिरों का नरसंहार जारी नहीं रहने देगा।

मुहाजिर वे मुसलमान हैं जो 1947 में मौजूदा भारत के हिस्सों से पाकिस्तान गए थे। अल्ताफ हुसैन की अपील स्पष्ट करती है कि इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान के निर्माण का विचार कितना खोखला साबित हुआ। बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो जिहादी मानसिकता वाला पाकिस्तानी राज्य तंत्र अपने देश के तकरीबन सभी हिस्सों और अपने दो प्रमुख पड़ोसी देशों भारत एवं अफगानिस्तान के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष युद्ध की स्थिति में है। ऐसे में कहना कठिन है कि भविष्य में इसका क्या स्वरूप होगा, परंतु इतिहास कुछ सबक तो देता है। अस्सी के दशक में बर्लिन की दीवार को स्थायी समझा जाने लगा था, लेकिन पूर्वी जर्मनी की जनता द्वारा ही उसे ध्वस्त किया गया। आज का पाकिस्तान पूर्वी जर्मनी से कहीं अधिक अस्थिर जान पड़ता है। प्रधानमंत्री गुजराल के समय से शुरू की गई पाकिस्तान के अलगाववादी आंदोलनों से दूर रहने की नीति ने पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध आतंकवाद जारी रखने का मौका दिया है।

अगर भारत पाकिस्तान में पनप रहे असंतोष और वहां के अलगाववादी आंदोलनों को नजरअंदाज करता है तो भविष्य मे अपने लिए बड़े खतरे को जन्म लेने देने का जोखिम लेगा। अतीत में भारत से ऐसी भूल तब हो चुकी है जब 1947 में पख्तून नेता खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व वाले खुदाई खिदमतगार आंदोलन को सहायता नहीं दी गई और धीरे-धीरे आइएसआइ समर्थित जिहादी संगठनों ने इस कबीलाई क्षेत्र के नौजवानों को कट्टरपंथ की राह पर धकेल दिया। नतीजतन सीमांत गांधी कहे जाने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान का यह क्षेत्र आज तालिबान, अलकायदा और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों का गढ़ बन चुका है। आज जमात-उद-दावा जैसे संगठन सिंध और बलूचिस्तान के युवाओं को भी आतंकवाद की राह पर ले जा रहे हैं।

अगर ये संगठन सफल हुए तो भारत और पूरे विश्व के लिए आतंकी खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।11947 में भारत ने तो पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया, लेकिन आज खुद उसके घटक ही पाकिस्तान के मूल विचार को नकार रहे हैं। पाकिस्तान में उभरता असंतोष स्वत:स्फूर्त है। ऐसे में भारत को वहां की घटनाओं के प्रति न केवल सजग रहना चाहिए, बल्कि उन्हें सही दिशा एवं गति देने का कौशल विकसित करना चाहिए। यह आवश्यक है कि भारत गुलाम कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान, सिंध और बलूचिस्तान में पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे अत्याचारों की ओर विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित करे। बलूच जनता को विश्व से उतनी ही सहानुभूति की जरूरत है जितनी इस्लामिक स्टेट से पीड़ित यजीदी समुदाय को मिल रही है।